स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ दर्ज पक्सो एक्ट के मामले की निष्पक्ष जांच कराएं, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष ने पीएम मोदी को लिखा पत्र

 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ दर्ज पक्सो एक्ट के मामले की निष्पक्ष जांच कराएं, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष ने पीएम मोदी को लिखा पत्र



स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर यौन शोषण के आरोप में पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ है। इस पर यूपी कांग्रेस अध्यक्ष ने पत्र लिखकर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है।


उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के खिलाफ दर्ज पॉक्सो एक्ट केस की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है। अजय राय ने लिखा है कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए। अजय राय ने अपने पत्र में लिखा है कि यह कार्रवाई तब हुई, जब स्वामी जी ने कुंभ मेले की अव्यवस्थाओं पर प्रदेश सरकार को घेरा था, जो सीधे तौर पर 'राजनीतिक प्रतिशोध' की बू देता है। कांग्रेस का स्पष्ट मानना है कि अनुच्छेद 25-26 के तहत मिली धार्मिक स्वायत्तता और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान होना चाहिए।



अजय राय ने लिखा, "किसी भी आध्यात्मिक पद की गरिमा को सियासी रंजिश का हथियार बनाना लोकतंत्र और संविधान, दोनों के खिलाफ है। हम मांग करते हैं कि किसी स्वतंत्र या केंद्रीय एजेंसी से इसकी जांच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके और सत्ता के हंटर से संतों की आवाज दबाने की कोशिश बंद करें!" उन्होंने आरोप लगाया कि सीएम योगी का प्रशासन अनावश्यक कठोरता अपना रहा है। इससे समाज में गलत संदेश जा रहा है।

पीएम मोदी से हस्तक्षेप की अपील

अजय राय ने अपनी पत्र में पीएम मोदी से तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने लिखा, "प्रधानमंत्री जी, यदि किसी शीर्ष धर्माचार्य के विरुद्ध उत्पन्न परिस्थितियों से यह धारणा बनती है कि शासन और आध्यात्मिक परंपरा के मध्य अनावश्यक टकराव की स्थिति है, तो इससे व्यापक धार्मिक समाज में असंतोष एवं पीड़ा की भावना उत्पन्न हो सकती है। भारतीय समाज में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाहियां अनावश्यक कठोरता या प्रतिशोधात्मक भावना से प्रेरित हैं। यदि ऐसा है, तो इससे न केवल राज्य की छवि धूमिल होती है, बल्कि केंद्र सरकार की शासकीय क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है। ऐसी किसी भी धारणा का समय रहते निराकरण अत्यंत आवश्यक है। यह विषय आस्था, संवैधानिक अधिकारों और शासन की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है।"

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