अब IRGC के हाथों में ईरान की सत्ता! हर फैसले में बढ़ा दखल, लिबरल नेता हुए साइडलाइन-रिपोर्ट

 

अब IRGC के हाथों में ईरान की सत्ता! हर फैसले में बढ़ा दखल, लिबरल नेता हुए साइडलाइन-रिपोर्ट


Edited by : Pratik Sahu



ईरान में अब IRGC ने सत्ता पर अहम नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के अंदर फैसला लेने की प्रक्रिया पर अब IRGC की छाप स्पष्ट रूप से नजर आ रही है। लिबरल नेताओं को किनारे लगा दिया गया है।


ईरान की सत्ता पर अब कट्टरपंथी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का कब्जा हो गया है।  'द न्यूयॉर्क पोस्ट' की एक रिपोर्ट के अनुसार IRGC ने देश की सैन्य और कूटनीतिक फ़ैसले लेने की प्रक्रिया पर प्रभावी रूप से कब्ज़ा कर लिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि यह बदलाव वीकेंड में हुआ। इस बदलाव के तहत IRGC कमांडर अहमद वाहिदी और उनके करीबी सहयोगियों ने प्रमुख नेतृत्व की भूमिका संभाल ली है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में तनाव तेजी से बढ़ रहा है और अमेरिका के साथ वार्ता भी लगभग टूटने की कगार पर है। 

शीर्ष स्तर पर लिए गए फैसलों को पलटा

वाशिंगटन स्थित 'इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर' ने बताया कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची सहित अधिकांश लिबरल नेताओं को किनारे करते हुए IRGC ने शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर होनेवाले फैसलों को अपने हाथों में ले लिया है। ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत के बाद होर्मुज को खोले जाने का ऐलान कर दिया था लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक  IRGC ने उनके फ़ैसले को पलट दिया और ज़ोर देकर कहा कि ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी दबाव के जवाब में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद ही रहना चाहिए।

IRGC ने अपना दखल बढ़ाया

रिपोर्ट के मुताबिक IRGC के कमांडर वाहिदी ने ईरान की 'सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल' के सचिव मोहम्मद बाघर ज़ोलघाद्र का समर्थन हासिल कर लिया है, जिससे सैन्य और रणनीतिक अभियानों पर उनकी पकड़ और मज़बूत हो गई है। IRGC ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ा दी है, और हाल के संघर्षों में अपनी पारंपरिक नौसेना को हुए नुकसान के बाद अब वह तेज़ी से हमला करने वाले जहाज़ों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है।

कूटनीतिक फैसलों में भी दिखा असर

रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी नेतृत्व में मतभेद भी सामने आए हैं। ईरान की 'सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल' के सचिव मोहम्मद बाघर ज़ोलघाद्र का प्रभाव कूटनीतिक प्रयासों तक भी फैल गया है। उन्हें इस महीने की शुरुआत में ईरान की वार्ता टीम में शामिल किया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि IRGC के निर्देशों और सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई के अधिकार का पालन हो। 'इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर' ने प्रतिनिधिमंडल के भीतर आंतरिक मतभेदों का ज़िक्र करते हुए बताया कि ज़ोलघाद्र ने IRGC नेतृत्व से शिकायत की कि अराघची ने तथाकथित 'प्रतिरोध की धुरी' (Axis of Resistance) के लिए ईरान के समर्थन के मामले में लचीलापन दिखाकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। रिपोर्ट के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप वार्ता टीम को तेहरान वापस बुला लिया गया, जिसे हुसैन ताइब सहित अन्य हस्तियों का समर्थन प्राप्त था।

आगे बातचीत की संभावनाएं कमजोर हुईं

विश्लेषकों का मानना है कि अब वाहीदी और मुज्तबा खामेनेई ईरान में प्रमुख निर्णयकर्ता बनकर उभरे हैं। इससे पश्चिमी देशों के साथ बातचीत की संभावनाएं और कमजोर पड़ सकती हैं। बता दें कि होर्मुज में तनाव तब और बढ़ गया जब ईरान ने इस रास्ते से गुजरनेवाले जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। दो भारतीय जहाजों पर भी फायरिंग की गई। जिससे फ़ारसी खाड़ी में सैकड़ो जहाज़ फंस गए और नाकेबंदी और मज़बूत हो गई। इस बीच अमेरिका ने ईरान के कार्गो शिप पर हमला कर उसे अपने कब्जे में ले लिया है। इससे एक बार फिर खाड़ी के क्षेत्र में युद्ध के बाद मंडराने लगे हैं।

जानकारों का कहना है कि सत्ता में इस बदलाव से पश्चिम के साथ बातचीत की संभावनाएं काफ़ी कम हो गई हैं, क्योंकि अराघची और ग़ालिबफ़ जैसे लोगों के पास नीति को प्रभावित करने का अधिकार नहीं है। इन घटनाओं ने वॉशिंगटन के इस दावे को भी चुनौती दी है कि हाल ही में बड़े अधिकारियों के मारे जाने के बाद ईरान का नेतृत्व नरम पड़ गया है। नई बातचीत के लिए कोई साफ़ समय-सीमा न होने के कारण, इस बात पर अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या यह नाज़ुक संघर्ष-विराम मौजूदा समय-सीमा के बाद भी बना रहेगा।

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