'वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है, बच्चा अपनी मातृभाषा में ही भारत को समझ सकता है', मुंबई में बोले अमित शाह
Edited by : Pratik Sahu

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा है कि वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है। मातृभाषा के महत्व पर उन्होंने कहा कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा में ही भारत को समझ सकता है।
वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं- अमित शाह
अमित शाह ने कहा- "वंदे मातरम् कोई एक गीत नहीं है। वंदे मातरम् घनघोर गुलामी के कालखंड में भारतीय चेतना को जागरूक करने का ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का प्रयास था। उन्होंने अपनी कविता से भारत की सोई हुई चेतना को झंझोड़ने का काम किया। आनंद मठ में लिखा गया यह गीत देखते-देखते पूरे भारत में आजादी की उद्घोषणा बन गया। मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि बंकिम चंद्र जी ने वंदे मातरम् की उद्घोषणा के साथ न केवल आजादी की उत्कंठा को, आजादी प्राप्त करने की तीव्र भावना को जागृत किया बल्कि उन्होंने इसके साथ-साथ भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव डालने का काम भी किया था। मित्रों, वो वंदे मातरम्, उसके टुकड़े कर दिए। आजादी के बाद भी इसके पूर्ण स्वरूप को स्वीकार करते-करते देश की संसद को 80 साल लग गए। नरेंद्र मोदी एक ऐसे प्रधानमंत्री मिले जिन्होंने वंदे मातरम् को फिर से एक बार पूर्ण स्वरूप, गौरव के साथ सरकारी समारोहों में शामिल करने का काम किया।" इससे पहले रविवार को मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा था कि भारत के ज्ञान को खत्म करने की कोशिश हुई।
मातृभाषा में ही भारत को समझा जा सकता है- अमित शाह
अमित शाह ने कहा- "संविधान निर्माताओं ने सोच समझकर ही हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार करने का निर्णय किया। और आज इतने साल के बाद जब से नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से राजभाषा विभाग में ढेर सारी उपलब्धियां आई हैं। सबसे बड़ा काम नरेंद्र मोदी जी ने यह किया है कि नई शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को सीखना अनिवार्य कर दिया। बच्चा अपनी मातृभाषा सीखे बगैर बड़ा व्यक्ति बन ही नहीं सकता है। क्योंकि मां के दुलार को, बहन के प्यार को अपनी मातृभाषा के बगैर वह समझ नहीं सकता है। अपनी भूमि से, अपनी भाषा से, अपने धर्म से, अपनी परंपराओं से,संस्कृति से और संस्कार से उसका लगाव मातृभाषा के माध्यम से ही हो सकता है। जो लोग भाषाओं के बीच में विवाद खड़ा करना चाहते हैं मैं उनको एक ही बात कहना चाहता हूं कि बच्चा अपनी मातृभाषा में ही भारत को समझ सकता है। अगर वह विदेशी भाषा में समझेगा तो भारत को समझने में वह गलती कर देगा। इसलिए हम सब राजनीतिक मतभेद छोड़कर भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर जोर रखें।"
रवींद्रनाथ टैगोर का भी जिक्र
अमित शाह ने कहा- "हमारे प्रधानमंत्री ने जो पांच प्रण लाल किले की प्राचीर से देश की जनता के लिए है रखे हैं, उसमें एक प्रण गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का भी है। मित्रों कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर से बड़ा कोई व्यक्ति हो नहीं सकता। भाषाओं को लेकर मैं उनका एक उद्गार आप सबके सामने पढ़ना चाहता हूं। भारतीय संस्कृति, साहित्य एक विकसित, शतदल कमल की तरह है, जिसकी प्रत्येक पंखुड़ी हमारी प्रादेशिक भाषाएं हैं। किसी भी एक पंखुड़ी को नष्ट होने से कमल का सौंदर्य, शोभा नष्ट हो जाएगी।"